महर्षि वाल्मीकि जयन्ती के अवसर पर ‘वाल्मीकिरामायणानुगुणं सामाजिकसमरसता’ विषय पर व्याख्यान गोष्ठी व संस्कृत कवि सम्मेलन का आयोजन

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उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ द्वारा संस्थान परिसर में आज महर्षि वाल्मीकि जयन्ती समारोह के अवसर पर ‘वाल्मीकिरामायणानुगुणं सामाजिकसमरसता’ विषय पर व्याख्यान गोष्ठी व संस्कृत कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यकम का शुभारम्भ सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन, माल्यार्पण के पश्चात् मुख्य अतिथियों का वाचिक स्वागत कर किया गया।

कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्थान के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी दिनेश कुमार मिश्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि हम सब आज उन महान ऋषि को नमन करने के लिए एकत्र हुए हैं, जिन्होंने मानवता को ज्ञान, साहित्य और आदर्श जीवन का अमूल्य उपहार दिया, वे हैं आदिकवि महर्षि वाल्मीकि जी। महर्षि वाल्मीकि को आदिकवि इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने संसार का पहला महाकाव्य ‘रामायण’ की रचना की थी। रामायण न केवल एक कथा है, बल्कि यह जीवन का मार्गदर्शन है, इसमें श्रीराम के आदर्श जीवन, मर्यादा, कर्तव्य और सत्य के मार्ग का गहन वर्णन मिलता है। महर्षि वाल्मीकि का जीवन हमें सिर्फ ज्ञान ही नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी प्रेरणा भी देता है कि मनुष्य जन्म से महान नहीं होता, बल्कि अपने कर्मों से महान बनता है। हर व्यक्ति के अंदर बदलाव की शक्ति होती है, बस आवश्यकता है सच्चे प्रयास और सही दिशा की।

संस्कृत कवि सम्मेलन में प्रो० अभिराज राजेन्द्र मिश्र ने अपने काव्य पाठ में बताया कि ष्राम को विश्वपुरूष के रूप में दर्शाया। पाश्चात्य कथाओं से तुलना एवं रामायण की सार्वभौमिकता को बताया। विश्व के अनेक लेखकों के लिए आदर्शभूत राम के चरित्र को बताया एवं राम को विकृत न करने की अपील की। प्रो० ओम प्रकाश पाण्डेय ने महर्षि वाल्मीकि के प्रथम काव्य कलाधर के रूप में वर्ण करते हुए काव्य पाठ प्रस्तुत किया। डॉ० अरविन्द कुमार तिवारी ने वाल्मीकी रामायण में सामंजस्य राम के महत्व एवं उदार चरित्र को प्रकाशित किया। डॉ० शशिकान्त तिवारी श्शशिधर ने अपने काव्य पाठ में बताया कि जिस श्लोक के द्वारा व्याधा शापित होता है वह श्लोक इस संसार का पहला लौकिक पद्य है। वहाँ से वाल्मीकि रामायण प्रारम्भ होती है। डॉ० हर्षित मिश्र ने बताया कि कौंच पक्षी का विलाप सुनकर हृदय में स्फूर्ति जागृत हुयी रस रूप में श्लोक प्रस्फुटित हुआ। डॉ० सिंहासन पाण्डेय, ने बताया कि आज भी जब हम रामायण पढ़ते हैं, तो हमें यह महसूस होता है कि उनके शब्दों में सत्य की वह शक्ति है जो मनुष्य को भीतर से बदल देती है। अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, ज्ञान और सत्य का प्रकाश उसे मिटा सकता है। डॉ० राजेन्द्र त्रिपाठी ‘रसराज’ ने बताया कि हम महर्षि वाल्मीकि जी के आदर्शों को अपने जीवन में उतारेंगे। हम दूसरों के प्रति प्रेम, करुणा और समानता की भावना रखेंगे। हम सत्य के मार्ग पर चलेंगे और समाज में अच्छाई फैलाएँगे। डॉ० दीपक मिश्र द्वारा महर्षि वाल्मीकि पर स्वरचित कविता ‘जयति जयति रघुकुलवरराम प्रेयसि कथमं नागता’ का पाठ किया गया। उपर्युक्त कार्यक्रम में संस्थान के समस्त अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ-साथ श्रोता उपस्थित रहे।

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